723 लोगों ने दिल दान दिया , बची एक हज़ार लोगों की जिंदगी

723 लोगों ने दिल दान दिया , बची एक हज़ार लोगों की जिंदगी ,
एक दिल से बचते है चार लोग

नई दिल्ली, 1 मार्च ( पी 2 पी ). अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के चिकित्सकों ने दान में मिले दिल की मदद से हाल ही में पांच साल के एक बच्चे के वॉल्व की मरम्मत कर उसे नई जिंदगी दी. एम्स के कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्क्युलर डिपार्टमेंट (सीटीवीएस) ने होमोग्राफ्ट वॉल्व के जरिए जन्म के समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे जिस बच्चे की जान बचाई है, वह इस तरह का 1000वां मरीज है. एम्स को अब तकक 723 दिल दान में मिल चुके हैं, जिनसे 1 हजार लोगों को नई जिंदगी मिल चुकी है.

सीटीवीएस के प्रमुख डॉ. शिव चौधरी ने बताया कि होमोग्राफ्ट टिश्यू (ऊतक) का एक शरीर से निकालकर दूसरे शरीर में प्रत्यारोपण किया जाता है. दिल की सर्जरी में होमोग्राफ्ट की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने बताया कि होमोग्राफ्ट वॉल्व व टिश्यू (ऊतक) को सड़क हादसे में मारे गए लोगों के शवों से उनके परिजनों की सहमति के बाद लिया जाता है.

डॉ. शिव चौधरी ने बताया कि अब तक एम्स को 723 लोगों के परिजनों ने दिल दान किए, जिनसे 1564 वॉल्व और अन्य टिश्यू सुरक्षित किए गए. चौधरी ने बताया कि यह दो तरह के मरीजों में बेहद उपयोगी है. पहला उन बच्चों में जिनके दिल में जन्म के समय से ही परेशानी होती है. जैसे कुछ बच्चों में लंग्स (फेफड़े) के साथ जुड़ाव और दाहिनी तरफ का दिल पूरी तरह से विकसित नहीं होता है. इस तरह के बच्चों के लिए होमोग्राफ्ट अनमोल है. दूसरा, मरीज के स्वयं के अनियंत्रित संक्रमण के कारण वॉल्व खराब हो जाता है.

डॉ. चौधरी के अनुसार किसी हादसे में या किसी बाहरी चोट के कारण जान गंवाने वाले व्यक्ति की मौत के 24 घंटे के अंदर हमें शरीर से दिल निकालना होता है. इसके साथ इसके आसपास की जुड़ी कुछ और चीजों जैसे- मैंब्रेन और उससे जुड़ी आर्टरी को भी लिया जाता है. हार्ट सर्जरी में एक मृतक के दिल और होमोग्राफ्ट से दो से चार मरीजों का इलाज किया जाता है जिसमें दो वॉल्व, एओरटा, पेरिकार्डियम शामिल है. डॉ. चौधरी ने बताया कि मृत व्यक्ति के पोस्टमार्टम से पहले उसके परिजनों से अंगदान का अनुरोध किया जाता है.

ऑपरेशन पर खर्च सिर्फ 5 हजार

डॉ. चौधरी ने बताया कि एम्स में इलाज कराने वाले मरीजों के लिए ऑपरेशन बेहद किफायती दर पर यानि सिर्फ पांच हजार रुपए पर उपलब्ध है. जबकि बाजार में उपलब्ध दूसरे विकल्प के इस्तेमाल में 2 से 4 लाख रुपए का खर्च आता है. उन्होंने कहा कि कम खर्च के बाद भी होमोग्राफ्ट वाल्व व ऊतकों की उपलब्धता बेहद कम है. यहां तक की ्रढ्ढढ्ढरूस् में भी इनके मरीजों की प्रतीक्षा सूची लंबी है. इसका बड़ा कारण है समाज में अंगदान के प्रति लोगों में कम जागरुकता. सामाजिक रूढिय़ों की वजह से लोग मौत के बाद परिजनों के अंगदान से परहेज करते हैं, जबकि मृत शरीर के दान किए गए अंगों से कई अनमोल जीवन बचाए जा सकते हैं. गौरतलब है कि एम्स में 1994 में प्रोफेसर ए. संपत द्वारा कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्क्युलर सर्जरी (सीटीवीएस) डिपार्टमेंट में वॉल्व बैंक की स्थापना की गई थी. यह देश का सबसे पुराना और सफल हार्ट वॉल्व बैंक और उत्तर भारत का एकमात्र दिल के वाल्व का बैंक है.